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अतिक्रमणकारियों ने नहीं छोड़े ताल तलैया कूप एवं पोखर मिटती जा रही है सांस्कृतिक धरोहरें

Gargachary Times 31 January 2026, 18:38 228 views
Dholpur
अतिक्रमणकारियों ने नहीं छोड़े ताल तलैया कूप एवं पोखर मिटती जा रही है सांस्कृतिक धरोहरें
मैंने अपनी खुशक आंखों से लहू छलका दिया। एक समंदर कह रहा था मुझको पानी चाहिए।। यह शेर परंपरागत जल स्रोतों पर सटीक बैठता है भारतवर्ष के ग्रामीण जीवन में पोखर ताल तलैया एवं कुआं को केवल जल स्रोत ही नहीं पर्यावरण संतुलन रोजगार पशुपालन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के तौर पर जाना जाता था यही कारण था कि प्रत्येक गांव के निचले भाग में कच्ची पोखरो एवं ताल तलैया को बनाया जाता था जिससे भूमिगत जल स्तर में सुधार हो तथा ग्रामीण घरों से उपयोग के बाद निकला पानी इन पोखरों में एकत्रित होता था इसे एक तरह से हमारे पूर्वजों का ड्रेनेज सिस्टम कहा जा सकता है अधिक वर्षा होने पर बरसात का पानी इन्हीं पोखरो में इकट्ठा होता था पोखर के ऊपर ओवरफ्लो होने के बाद ही पानी दूसरी जगह पर जा सकता था यही कारण है कि पहले ग्रामीण क्षेत्रों में कच्चे घर होने के बावजूद पानी का भराव नहीं के बराबर था पोखरा एवं ताल तलैया किसानोकी सिंचाई का भी प्रमुख आधार थे तथा हमेशा पानी भरा रहने से भूमिगत जलस्तर नीचे जाने की संभावना नहीं के बराबर थी लगातार अकाल पड़ने पर पोखर का पानी पूरी तरह सूख चुका हो तब तक जलस्तर नीचे जाने की संभावना नहीं के बराबर थी इसके अलावा गांव में जिनकुओं से पीने का पानी लिया जाता था उनका जलस्तर भी ऊपर रहता था तथा पर्याप्त मात्रा में पेयजल उपलब्ध रहता था गांव के पशुओं को इन्हीं पोखरो में नहलाया जाता था तथा पानी भी पिलाया जाता था अधिकांश यहीं पर कपड़ों की साफ सफाई की जाती थी पोखर की नमी के कारण चारों तरफ हरियाली एवं पेड़ों से छांव रहती थी जहां गर्मियों में ग्रामीण एवं बच्चे आराम करते थे वर्षा नहीं होने से जब इन पोखरों में पानी उतर जाता था तो यहीं से कुंभकारों केउपयोग हेतु मिट्टी लाई जाती थी जिससे पोखरो की सफाई के साथ-साथ उनकी गहराई भी पर्याप्त रहती थी पोखरे न केवल पेयजल बल्कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी प्रमुख स्थान रखती थी बिहार में छठ पूजा से अच्छा इसका उदाहरण और कहां मिल सकता है आजीविका की दृष्टि से देखें तो ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए चिकनी मिट्टी इन्हीं पोखरो से ली जाती थी बड़ी तादाद में सिंघाड़े की खेती भी इन्हीं जलाशयोमेहोती थी जिससे उसकी अच्छी खासी आमदनी होती थी मच्छी पालन का काम भी इन्हीं पोखरोमे किया जाता था जिससे लोगों को रोजगार मिलता था वन्य जीव जंतु एवं जानवरों को पशु पक्षियों को पीने का पानी स्वतंत्र रूप से उपलब्ध था भारत में पाई जाने वाली कैंचुयों की संख्या में लगातार गिरावट का कारण भी जलाशयो एवं पोखरों का समाप्त होना माना जा सकता है यही कारण है की गौरैया चिड़ियो के झुंडअब दिखाई नहीं देते आज भी कई कुंडो एवं जलाशयों में स्नान करने के बाद त्वचागत रोगो के समाप्त होने का दावा करने वाले बहुत से लोग मिल जाएंगे आयुर्वेदिक ग्रंथों की माने तो दिन में सूर्य की किरणों से तप्त एवं रात्रि में चंद्रमा की किरणे से शीतल जल को श्रेष्ठ जलो की श्रेणी में रखा गया है आधुनिक वैज्ञानिक युग में जीने कादंभ भरने वाले मानव ने आज ताल तलैया पोखरो को भी अतिक्रमण की चपेट में ले लिया है जहां येपोखरे हर दृष्टि से हमारी पहचान हुआ करती थी आज अतिक्रमणकारियों की चपेट में आ चुकी हैं पोखरों की जगह ऊंचे मकान दिखाई देने लगे हैं जहां जिसको मौका मिला उतनी जमीन पर अतिक्रमण करने का दौर अनवरत चलता गया और पोखरों की जगह पर अट्टालिकाएं बंनती चली गई जंगली वन्य जीव पशु पक्षियों की जगह आदमी ने अपना कब्जा जमा लिया तथा पोखरों की जगह घनी बस्तियां बसती चली गई इस अतिक्रमण के लिए अकेले अतिक्रमण कारियों को एक तरफा जिम्मेदारम नहीं ठहराया जा सकता सरकारी मशीनरी एवं जिम्मेदार कर्मचारी इस सबके लिए अतिक्रमणकारियों से ज्यादा जिम्मेदार हैं सरकारी नुमाइंदोके द्वारा अतिक्रमण कारियों के मूकसमर्थन से भी इनकार नहीं किया जा सकता धीरे-धीरे पूर्वजों द्वारा ग्रामीणों के स्वास्थ्य एवं पर्यावरण को ध्यान में रखकर जो ताल तलैया एवं पोखरा बनवाए थे वह अब तक अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुकी हैं आवश्यकता है अतिक्रमणकारियों के चंगुल से मुक्त कराया जाए ताकि इनका लाभ हम लोगोंलोगों एवं पशु पक्षियों को मिल सके
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