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आध्यात्मिक साधना का केंद्र है, सैंपऊ का ऐतिहासिक महादेव मंदिर

Gargachary Times 13 February 2026, 19:51 31 views
Dholpur
आध्यात्मिक साधना का केंद्र है, सैंपऊ का ऐतिहासिक महादेव मंदिर
कस्बे का ऐतिहासिक महादेव जी मंदिर न सिर्फ आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मंदिर में पत्थरों पर की गई बेजोड़ नक्काशी अनायास ही दांतों तले उंगली दवाने पर विवश करती है। उपखंड मुख्यालय सैंपऊ से दो किलोमीटर दक्षिण दिशा की ओर चलने पर सड़क मार्ग से मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग में भगवान राम ने यहां गुरु विश्वामित्र के साथ इस शिवलिंग की स्थापना की थी। ऐसा माना जाता है कि संवत 1305 में श्याम रतनपुरी बाबा को स्वप्न आने के बाद इस शिवलिंग के ऊपर से झाड़ियों को काटा गया तथा कुछ प्रयासों के बाद शिवलिंग के दर्शन हुए। श्याम रतनपुरी बाबा को सैंपऊ भोला मंदिर का प्रथम पुजारी माना जाता है। मौर्यकालीन स्थापित्य कला का बेजोड़ नमूना यह भव्य मंदिर दूर से किलेनुमा दिखता है। मंदिर के तीन प्रवेश द्वार हैं। भूतल से करीब दस फीट की ऊंचाई पर बीस सीढ़ियां चढ़कर मंदिर में प्रवेश होता है। चारों ओर विशाल बरामदे हैं। मंदिर में धौलपुर के लाल पत्थरों का उपयोग किया गया है। बीच में बने शिवालय के आठ द्वार हैं। शिखर करीबन चालीस से पैंतालीस फीट ऊंचा है। जहां धर्म ध्वजा फहराती है। मंदिर के ऊपरी हिस्से पर खड़ा होकर केशर बाग की जलती बिजली देखने का अलग ही आनंद है। किंतु बरामदों को जालियां लगाकर बंद करने से लोगों का ऊपर तक पहुंचना अब संभव नहीं हो पाता और टीन शेड से मंदिर परिसर को ढक देने से प्राकृतिक सौंदर्य नदारद हो चुका है।महाशिवरात्रि को यहां रात्रि जागरण में भक्तों द्वारा अखंड दीपक जलाने का विधान है। किंतु ऊपर जाने का रास्ता बंद होने से लोगों को बैठने तक की जगह नहीं मिलती। महाशिवरात्रि को भोले बाबा की चार आरतियां की जाती हैं। इस दौरान भक्तों का हुजूम उमड़ते देखा जा सकता है। महाशिवरात्रि को देशभर से श्रद्धालुओं के अलावा गंगा जी से कठोर परिश्रम कर लाई गई कावड़ें चढ़ाने वालों का तांता लगा रहता है। किंतु अब लोगों में अपने अपने मंदिरों पर कावड़ चढ़ाना शुरू कर दिया है। जिससे पहले की अपेक्षा कावड़ियों की संख्या में कमी आई है। बताया जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना हेतु महाराजा कीरत सिंह ने खूब प्रयास किए किंतु काफी खुदाई के बाद भी इसका अंत नहीं मिला उनके पुत्र महाराजा भगवन्त सिंह ने अपने कार्यकाल में यह भव्य मंदिर का निर्माण कराया। जिसमें उनके संरक्षक कन्हैया लाल राजधर का महत्वपूर्ण योगदान रहा। मंदिर के प्रवेश द्वार के बगल में इस शिवलिंग के प्रथम पुजारी श्यामरतन पुरी महाराज की जीवित समाधि है। जहाँ सैकड़ों वर्षों से गाय के गोबर से बने उपले की धूनी लगाई जाती है। मंदिर के बाहर विशाल मेला स्थल है। जहाँ पानी के लिए विशाल बावड़ी है। मंदिर की परिक्रमा मार्ग में बड़े-बड़े कमरों की स्थानीय निवासियों ने अपने आसियाने बना लिए हैं। पहले यहाँ जंगल था किंतु आज यहाँ सरकारी डिग्री कॉलेज बनने से विकास की एक नई किरण दिखाई दे रही है। स्थानीय नागरिकों ने जनप्रतिनिधियों से लेकर सरकारी नुमाइंदों से मंदिर के जीर्णोद्वार की मांग की परंतु फ़िलहाल परिणाम शून्य ही नजर आता है।
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