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दाऊजी हुरंगे में उमड़ा आस्था, उल्लास और रंगों का सैलाब, घूंघट में आई महिलाओं ने हुरियारों के कपड़े फाड़े, प्रेमपूर्वक हुरियारों के शरीर पर बरसाए कोड़े

Gargachary Times 5 March 2026, 21:03 90 views
Dharam
दाऊजी हुरंगे में उमड़ा आस्था, उल्लास और रंगों का सैलाब, घूंघट में आई महिलाओं ने हुरियारों के कपड़े फाड़े, प्रेमपूर्वक हुरियारों के शरीर पर बरसाए कोड़े
मथुरा/बलदेव : ब्रज की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं बल्कि सदियों पुरानी परंपरा, भक्ति और उल्लास का ऐसा संगम है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं। बरसाना की लठमार होली, नंदगांव की हुरियारों वाली होली और वृंदावन-मथुरा की रंगोत्सव के बाद ब्रज की सबसे अनोखी और रोमांचकारी परंपरा दाऊजी मंदिर, बलदेव में मनाया जाने वाला प्रसिद्ध हुरंगा है। यहां ऐसा रंग बरसता है कि मानो तीनों लोक रंग और भक्ति में डूब गए हों। भगवान बलदाऊ जी और माता रेवती के पावन प्रांगण में आयोजित इस हुरंगे में हजारों श्रद्धालु रंग और भक्ति में सराबोर हो गए। मंदिर परिसर में बनी विशाल हौदियों में टेसू के फूलों से तैयार चटकीला रंग और निर्मल जल भरा गया था। जैसे ही प्रांगण में रंग की पहली बौछार पड़ी, वैसे ही "दाऊजी महाराज की जय" के जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठा। हुरंगे की शुरुआत ब्रज के राजा दाऊजी महाराज के प्रतीक स्वरूप रंग खेलने से हुई। इसके बाद पांडेय समाज के लोगों ने हौदियों से बाल्टियों में रंग भरकर एक-दूसरे पर जमकर उड़ेला और हुरंगे का आनंद लिया। देखते ही देखते पूरा मंदिर परिसर रंगों के सागर में बदल गया। परंपरा के अनुसार घूंघट में आई महिलाओं ने हुरियारों के कपड़े फाड़ दिए और उन्हीं कपड़ों से कोड़ा बनाकर प्रेमपूर्वक हुरियारों के शरीर पर बरसाए। वहीं हुरियारे भी सखियों पर टेसू का रंग उड़ाते हुए होली गीतों पर झूमते नजर आए। ढोल-नगाड़ों की गूंज, अबीर-गुलाल की उड़ती फुहार और जयकारों के बीच पूरा वातावरण उत्साह और भक्ति से सराबोर हो उठा। हुरंगे के दौरान एक अद्भुत दृश्य तब देखने को मिला जब हुरियारे बलराम और कृष्ण की ध्वजा लेकर पूरे उत्साह के साथ मंदिर की परिक्रमा करते नजर आए। परंपरा के अनुसार हुरियारिनें इस ध्वजा को छीनने का प्रयास करती हैं, जबकि हुरियारे उसे बचाने के लिए पूरा जोर लगाते हैं। इस अनोखी रस्म को देखने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। मंदिर परिसर में हर ओर अबीर-गुलाल उड़ रहा था। भजन-कीर्तन की धुनों के बीच लोग होली गीतों पर थिरकते नजर आए। भांग की तरंग और रंगों की उमंग ने माहौल को पूरी तरह मस्ती से भर दिया। इस अनोखी होली के साक्षी बनने के लिए अधिक श्रद्धालु यहां पहुंचे। यह कोड़ा मार होली केवल बलदेव मंदिर परिसर में ही खेली जाती है और इसमें गांव के पुरोहित परिवारों की विशेष भागीदारी होती है। मान्यता है कि जब भगवान कृष्ण पूरे ब्रज में एक महीने तक होली खेलते रहे, तब माता यशोदा ने बड़े भाई बलदेव को उनकी देखरेख के लिए साथ भेजा था। लगातार होली देखने के बाद बलदेव जी का भी मन रंग खेलने को हुआ और उन्होंने यहीं होली खेली। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। आज भी यह हुरंगा जेठ और बहू के बीच प्रेमपूर्ण हंसी-मजाक की होली के रूप में खेला जाता है, जो ब्रज की लोक संस्कृति की अनूठी पहचान है। हुरंगे की अनोखी परंपरा बलदेव में खेली जाने वाली यह होली कोड़ा मार हुरंगा के नाम से प्रसिद्ध है। महिलाएं हुरियारों के कपड़े फाड़कर उन्हीं से कोड़ा बनाती हैं। पुरुष हुरियारिनों पर टेसू के रंग की बौछार करते हैं। ढोल-नगाड़ों और होली गीतों के बीच पूरा प्रांगण रंगमय हो जाता है। फूलों से तैयार होता है रंग दाऊजी मंदिर के हुरंगे में परंपरागत रूप से टेसू के फूलों से तैयार प्राकृतिक रंग का उपयोग किया जाता है। हौदियों में पहले से टेसू के फूलों का रंग तैयार किया जाता है, जिसे बाद में बाल्टियों से भर-भरकर एक-दूसरे पर उड़ाया जाता है। ध्वजा छीनने की परंपरा हुरंगे के दौरान बलराम और कृष्ण की ध्वजा लेकर हुरियारे मंदिर की परिक्रमा करते हैं। परंपरा के अनुसार हुरियारिनें ध्वजा को छीनने का प्रयास करती हैं। इसे हंसी-मजाक और उत्साह की परंपरा माना जाता है। एक लाख से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचे दाऊजी के हुरंगे को देखने के लिए हर साल देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बार भी अनुमानित एक लाख से अधिक लोगों ने मंदिर परिसर में पहुंचकर इस अद्भुत परंपरा का आनंद लिया। हर बार से इस बार व्यवस्था बेहतर दाऊजी महाराज के भव्य हुरंगे में इस बार परिसर के अंदर की व्यवस्था को संभालने में समाज के कई लोगों का योगदान सराहनीय रहा। बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर बिल्कुल पाबंदी और समाज के लोगों को व्यवहारिक तरीके से प्रवेश दिया गया। जिससे हुरंगा उत्सव के दौरान इस बार अन्य वर्षों की तरह भीड़ का नजारा नहीं देखने को नहीं मिला। लोगों ने भी व्यवस्थाओं को सराहा। इस अवसर पर पुलिस प्रशासन के साथ एडवोकेट कुलदीप पांडेय, गोपाल पांडेय-चक्की वाले, विष्णु शास्त्री, पुनीत पांडेय, ब्रजेश बौहरे, बंटी पांडेय आदि समाज के लोग रहे।
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