उत्तर प्रदेश निजी बिजनेस पार्क विकास योजना-2025 को योगी कैबिनेट की मंजूरी, 30 मार्च से प्रारम्भ होगी गेहूं खरीद, सीएम योगी ने तय किया 50 लाख मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य
Gargachary Times
23 March 2026, 19:43
67 views
Lucknow
डॉ विवेक गर्गाचार्य, लखनऊ: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में सोमवार को लोकभवन में कैबिनेट की बैठक हुई। इसमें कुल 37 प्रस्ताव आए, जिसमें से कैबिनेट ने 35 को स्वीकृति प्रदान की। इसमें गेहूं खरीद पर भी निर्णय किया गया। कैबिनेट बैठक के बाद कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने पत्रकारों को इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी दी।
कृषि मंत्री ने बताया कि रबी विपणन वर्ष 2026-27 के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2585 रुपये प्रति कुंतल तय किया गया है। केंद्र सरकार ने गत वर्ष की तुलना में 160 रुपये प्रति कुंतल की वृद्धि की है। रामनवमी के उपरांत 30 मार्च से गेहूं खरीद होगी, जो 15 जून तक चलेगी।
कृषि मंत्री ने बताया कि प्रदेश में खाद्य विभाग की विपणन शाखा सहित कुल 8 एजेंसियों द्वारा 6500 क्रय केंद्र स्थापित होंगे। क्रय केंद्र सुबह 9 से शाम 6 बजे तक खुले रहेंगे। क्रय केंद्रों पर किसानों के लिए छाया, पानी व बैठने समेत सभी व्यवस्थाएं पूर्ण कराने के निर्देश दिए गए हैं।
उतराई, छनाई व सफाई के लिए किसानों को 20 रुपये प्रति कुंतल अलग से दिया जाएगा
कृषि मंत्री ने कहा कि उतराई, छनाई व सफाई के लिए किसानों को 20 रुपये प्रति कुंतल अलग से दिया जाएगा। किसानों ने इस साल प्रदेश के भीतर काफ़ी अच्छी फसल लगाई है। कृषि विभाग ने उन्हें पर्याप्त मात्रा में बीज भी उपलब्ध कराए हैं। पर्याप्त मात्रा में इसकी खरीद की जाए, जिससे किसानों को किसी प्रकार का नुकसान नहीं उठाना पड़े।
50 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीद का लक्ष्य
उन्होंने बताया कि खाद्य व रसद विभाग ने 30 लाख मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य रखा था, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे 50 लाख मीट्रिक टन किए जाने का निर्देश दिया है। मुख्यमंत्री ने 48 घंटे के भीतर डीबीटी के माध्यम से किसानों को भुगतान के भी निर्देश दिए हैं। बिचौलियों का हस्तक्षेप न रहे, इसलिए सारा सिस्टम ऑनलाइन कर दिया गया है।
लगभग दो लाख किसानों ने करा लिया पंजीकरण
गेहूं की बिक्री के लिए अब तक लगभग दो लाख किसानों ने पंजीकरण करा लिया है। खाद्य व रसद विभाग के मुताबिक 1,95,628 किसानों ने सोमवार दोपहर दो बजे तक पंजीकरण करा लिया है।
नवयुग पालिका योजना को योगी कैबिनेट की मंजूरी
प्रदेश में स्मार्ट सिटी मिशन के विस्तार और संतुलित शहरी विकास को गति देने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में “नवयुग पालिका योजना” को मंजूरी दे दी गई है। इस योजना के तहत 58 जिला मुख्यालयों के नगरीय निकायों को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा। राज्य सरकार ने पहली बार नगर निगमों से बाहर के नगरीय निकायों, विशेषकर जिला मुख्यालय स्थित नगर पालिका परिषदों और नगर पंचायतों को प्राथमिकता देते हुए विकास की नई रूपरेखा तैयार की है। योजना के अंतर्गत 55 नगर पालिका परिषदों, 3 नगर पंचायतों तथा गौतमबुद्धनगर की दादरी नगर पालिका परिषद को शामिल किया गया है।
5 वर्षों में 2916 करोड़ रुपये का निवेश
योजना के तहत प्रत्येक वर्ष 583.20 करोड़ रुपये की धनराशि खर्च की जाएगी, इस तरह 5 वर्षों (2025-26 से 2029-30) में कुल 2916 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। यह पूरी तरह राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित योजना है, जिसमें केंद्र सरकार की कोई भागीदारी नहीं होगी। नवयुग पालिका योजना के माध्यम से स्मार्ट सिटी की तर्ज पर डिजिटल गवर्नेन्स, ई-सेवाओं और तकनीकी समाधान को बढ़ावा दिया जाएगा। इससे नागरिक सेवाएं अधिक पारदर्शी, त्वरित और प्रभावी बनेंगी।
आधारभूत ढांचे का उन्नयन और जीवन स्तर में सुधार
योजना का मुख्य उद्देश्य नगरीय निकायों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, स्वच्छ एवं सुव्यवस्थित वातावरण उपलब्ध कराना तथा नागरिकों के जीवन स्तर (ईज ऑफ लिविंग) में सुधार लाना है। इसके तहत सड़कों, जल निकासी, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था और अन्य नागरिक सुविधाओं का व्यापक विकास किया जाएगा। जिला मुख्यालयों को विकसित करने से विभिन्न मंडलों के बीच विकास असमानताओं को कम करने में मदद मिलेगी। इससे नगर निगमों से बाहर के क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और संतुलित शहरी विकास सुनिश्चित होगा।
चयन और क्रियान्वयन की स्पष्ट व्यवस्था
परियोजनाओं के चयन के लिए जनपद स्तर पर समितियों का गठन किया जाएगा, जबकि राज्य स्तरीय तकनीकी समिति द्वारा परीक्षण के बाद सक्षम स्तर से अनुमोदन दिया जाएगा। इसके बाद ही विकास कार्यों का क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाएगा।
जनसंख्या के आधार पर दो श्रेणियों में विभाजित किया निकाय
प्रदेश के नगर विकास मंत्री एके शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार शहरों के समग्र और संतुलित विकास के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि जिस प्रकार बड़े नगर निगमों में स्मार्ट सिटी योजना के तहत आधुनिक सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है, उसी तर्ज पर अब जिला मुख्यालय स्तर के नगर पालिका क्षेत्रों को भी विकसित किया जाएगा। “नवयुग पालिका योजना” इसी सोच का परिणाम है। इसके अंतर्गत उत्सव भवन, ऑडिटोरियम, प्रदर्शनी केंद्र, पार्कों का विकास तथा विद्युत व्यवस्था के आधुनिकीकरण जैसे कार्य कराए जाएंगे। उन्होंने कहा कि निकायों को उनकी जनसंख्या के आधार पर दो श्रेणियों (डेढ़ लाख से अधिक और डेढ़ लाख से कम आबादी) में विभाजित किया गया है, ताकि उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप विकास कार्यों को प्राथमिकता दी जा सके।
प्रत्येक बिजनेस पार्क को 45 वर्षों के लिए किया जाएगा विकसित, प्रत्येक बिजनेस पार्क के लिए न्यूनतम 10 एकड़ भूमि का प्रावधान
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में “उत्तर प्रदेश निजी बिजनेस पार्क विकास योजना-2025” को मंजूरी दे दी गई है। इस योजना के तहत प्रदेश में विश्वस्तरीय प्लग-एंड-प्ले बिजनेस पार्क विकसित कर वैश्विक निवेश, रोजगार सृजन और औद्योगिक विकास को नई गति दी जाएगी। योजना के अंतर्गत प्रदेश में ऐसे बिजनेस पार्क विकसित किए जाएंगे, जहां वैश्विक निगमों के कार्यालय, अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) केंद्र, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) तथा संचालन केंद्र स्थापित किए जा सकेंगे। इन पार्कों में रेडी-टू-ऑपरेट और प्लग-एंड-प्ले सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी, जिससे सेवा और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में तेजी से विस्तार होगा।
रेडी-टू-यूज इंफ्रास्ट्रक्चर से घटेगी लागत और समय
अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव आलोक कुमार ने बताया कि अभी तैयार इंफ्रास्ट्रक्चकर के अभाव में परियोजनाओं में देरी और लागत वृद्धि होती है। यह योजना इस समस्या का समाधान करते हुए आधुनिक व रेडी-टू-यूज इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराएगी, जो प्रदेश की औद्योगिक निवेश नीतियों का पूरक बनेगा। विश्वस्तरीय बिजनेस पार्क्स की स्थापना से औद्योगिक सेटअप में तेजी आएगी, बड़े पैमाने पर निवेश आकर्षित होगा, हजारों रोजगार के अवसर सृजित होंगे, राज्य के राजस्व में वृद्धि होगी, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) और स्टार्टअप को समर्थन मिलेगा और औद्योगिक क्लस्टरिंग को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही साझा जोखिम (रिस्क शेयरिंग) मॉडल को प्रोत्साहन मिलेगा।
डीबीएफओटी मॉडल पर होगा विकास
योजना को डिजाइन, बिल्ट, फाइनेंस, आपरेट एवं ट्रांसफर (डीबीएफओटी) मॉडल के तहत लागू किया जाएगा। इसके माध्यम से निजी क्षेत्र की भागीदारी और दक्षता को बढ़ावा मिलेगा, जिससे परियोजनाओं का समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण क्रियान्वयन सुनिश्चित होगा। प्रत्येक बिजनेस पार्क को 45 वर्षों की रियायत अवधि पर विकसित किया जाएगा, जिसे आगे 45 वर्षों तक बढ़ाया जा सकेगा। इसके बाद विकसित संपत्तियां राज्य सरकार को हस्तांतरित कर दी जाएंगी। प्रत्येक बिजनेस पार्क के लिए न्यूनतम 10 एकड़ भूमि का प्रावधान किया गया है। हालांकि, स्थान विशेष की उपलब्धता और उपयुक्तता के आधार पर इसमें लचीलापन भी रखा गया है। योजना की वित्तीय संरचना में अपफ्रंट लैंड प्रीमियम और राजस्व भागीदारी शामिल होगी।
निजी डेवलपर पर पूरी जिम्मेदारी
चयनित डेवलपर को योजना के तहत डीबीएफओटी की पूरी जिम्मेदारी उठानी होगी। रियायत अवधि के दौरान डेवलपर को परियोजना के सभी पहलुओं का प्रबंधन करना होगा। योजना लागू होने के बाद संबंधित औद्योगिक विकास प्राधिकरण या सरकारी भूमि स्वामित्व एजेंसियां आवेदन और बोली प्रक्रिया संचालित करेंगी। इसमें प्रस्ताव आमंत्रण, प्रारंभिक जांच और तकनीकी मूल्यांकन शामिल होगा। प्रस्तावों के मूल्यांकन के लिए एक स्क्रीनिंग समिति गठित की जाएगी, जो शॉर्टलिस्ट आवेदकों की सिफारिश आवंटन समिति को करेगी। अंतिम भूमि आवंटन का निर्णय संबंधित प्राधिकरण द्वारा लिया जाएगा।
नियमित प्रगति रिपोर्ट अनिवार्य
विकासकर्ता को अर्धवार्षिक आधार पर प्रगति एवं वित्तीय रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, जिसमें भौतिक प्रगति, व्यय का विवरण और समय-सीमा के अनुपालन की जानकारी शामिल होगी। यह रिपोर्ट नामित प्राधिकरण को सौंपी जाएगी। इस योजना के अंतर्गत सभी निविदाएं राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) दिशा-निर्देशों के अनुसार जारी की जाएंगी। प्रत्येक निविदा के लिए संबंधित प्राधिकरण को अपने प्रशासनिक विभाग से अनुमोदन लेना अनिवार्य होगा। यह योजना कैबिनेट से अनुमोदित होने के बाद अधिसूचना जारी होने की तिथि से प्रभावी होगी। इसके बाद प्रदेश की विभिन्न भूमि स्वामित्व एजेंसियां बिजनेस पार्क विकास के लिए इस नीति को अपनाएंगी।
सम्भल में इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग एंड लॉजिस्टिक्स क्लस्टर को मिली मंजूरी
कैबिनेट बैठक में अटल इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन के तहत गंगा एक्सप्रेसवे के निकट जनपद सम्भल में इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग एंड लॉजिस्टिक्स क्लस्टर (आईएमएलसी) की स्थापना हेतु अवस्थापना विकास कार्यों को मंजूरी दे दी गई है। उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण द्वारा विकसित एक्सप्रेस-वे नेटवर्क के अंतर्गत 29 स्थलों पर प्रस्तावित इंडस्ट्रियल कॉरिडोर परियोजना के तहत यह क्लस्टर विकसित किया जाएगा, जिसमें सड़क, आरसीसी नालियां, कल्वर्ट, फायर स्टेशन, अवर जलाशय, जलापूर्ति लाइन, फेंसिंग, विद्युत सहित आधुनिक आधारभूत ढांचा तैयार किया जाएगा। परियोजना का निर्माण ईपीसी मॉडल पर किया जाएगा तथा प्रस्तावित 293.59 करोड़ रुपये की लागत के सापेक्ष वित्त समिति द्वारा अनुमोदित 245.42 करोड़ रुपये की धनराशि पर कैबिनेट ने अंतिम स्वीकृति प्रदान की है। इस परियोजना से सम्भल क्षेत्र में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ लॉजिस्टिक्स सुविधाएं सुदृढ़ होंगी और बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित होंगे, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी।
ग्रेटर नोएडा में मल्टीमोडल लॉजिस्टिक्स पार्क को मंजूरी, 174 एकड़ में विकसित होगा मेगा प्रोजेक्ट
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में “उत्तर प्रदेश मल्टी मोडल लॉजिस्टिक्स पार्क नीति-2024” के तहत ग्रेटर नोएडा में 174.12 एकड़ भूमि पर मल्टीमोडल लॉजिस्टिक्स पार्क (एमएमएलपी) की स्थापना के लिए नियम, शर्तें और ब्रोशर को मंजूरी दे दी गई है। राज्य सरकार की नीति के तहत न्यूनतम 1000 करोड़ रुपये के निवेश वाली मल्टीमोडल लॉजिस्टिक्स पार्क परियोजनाओं को प्रोत्साहन दिया जाएगा। ऐसी परियोजनाओं को 30% फ्रंट-एंड लैंड सब्सिडी प्रदान की जाएगी, जो केवल सरकारी या औद्योगिक विकास प्राधिकरण द्वारा लीज पर आवंटित भूमि पर ही अनुमन्य होगी। उच्च स्तरीय प्राधिकृत समिति (एचएलईसी) ने ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण (GNIDA) बोर्ड, मूल्यांकन समिति और औद्योगिक विकास विभाग की संस्तुति के आधार पर चयनित बिडर को 30% लैंड सब्सिडी देने के प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी। इसी के अनुरूप कैबिनेट ने अंतिम अनुमोदन प्रदान किया।
ग्रेटर नोएडा में 174.12 एकड़ भूमि पर विकसित होगा पार्क
ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण द्वारा सेक्टर कप्पा-02 (पूर्व में कप्पा-11) में स्थित लगभग 174.12 एकड़ (7,04,664 वर्ग मीटर) भूखंड पर इस मल्टीमोडल लॉजिस्टिक्स पार्क की स्थापना की जाएगी। इसके लिए तैयार योजना के नियम और शर्तों को उच्च स्तरीय प्राधिकृत समिति द्वारा भी अनुमोदित किया जा चुका है। भूखंड के आवंटन के लिए ई-नीलामी मॉडल अपनाया जाएगा। भारत में पंजीकृत साझेदारी फर्म, एलएलपी, निजी या सार्वजनिक लिमिटेड कंपनियां इसमें भाग ले सकेंगी, जबकि कंसोर्टियम या ज्वाइंट वेंचर को निविदा में भाग लेने की अनुमति नहीं होगी।
11,000 रुपये प्रति वर्गमीटर तय हुआ रिजर्व प्राइस
भूखंड का आरक्षित मूल्य 11,000 रुपये प्रति वर्गमीटर निर्धारित किया गया है। 30% फ्रंट-एंड लैंड सब्सिडी की गणना इसी रिजर्व प्राइस के आधार पर की जाएगी, जैसा कि नीति में प्रावधानित है। सफल बोलीदाता को परियोजना 7 वर्षों में पूर्ण करनी होगी, जिसमें पहले 3 वर्षों में कम से कम 40% कार्य पूरा करना अनिवार्य होगा। विशेष परिस्थितियों में अधिकतम 2 वर्षों का अतिरिक्त समय दिया जा सकता है। परियोजना के पूर्ण संचालन और निर्धारित निवेश प्रतिबद्धताओं की पूर्ति से पहले आवंटी को परियोजना से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी जाएगी, जिससे परियोजना की गंभीरता और समयबद्धता सुनिश्चित होगी।
प्लग-एंड-प्ले औद्योगिक शेड्स योजना-2026 को कैबिनेट की मंजूरी
योगी कैबिनेट ने उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के तहत डिजाइन-बिल्ड-फाइनेंस-ऑपरेट-ट्रांसफर (DBFOT) मॉडल पर आधारित “प्लग-एंड-प्ले औद्योगिक शेड्स योजना-2026” को मंजूरी दे दी है, जिसका उद्देश्य 1 ट्रिलियन डॉलर जीएसडीपी लक्ष्य के अनुरूप औद्योगीकरण को गति देना, विनिर्माण क्षमता बढ़ाना और उद्योगों की शीघ्र स्थापना सुनिश्चित करना है। वर्तमान लीज-एंड-बिल्ड मॉडल में उद्यमियों को भूमि लेने के बाद भवन, आंतरिक सड़क, ड्रेनेज, एसटीपी/ईटीपी और अग्निशमन जैसी सुविधाओं पर भारी निवेश करना पड़ता है, जिससे उत्पादन शुरू होने में 18-36 माह लग जाते हैं, जबकि इस योजना के तहत पूर्व-निर्मित, उपयोगिताओं से युक्त औद्योगिक शेड्स उपलब्ध कराकर एमएसएमई सहित उद्योगों को तुरंत संचालन योग्य इंफ्रास्ट्रक्चर मिलेगा, जिससे लागत घटेगी, उत्पादन तेजी से शुरू होगा और रोजगार सृजन बढ़ेगा। योजना में माइल्ड इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल-इलेक्ट्रॉनिक्स, ईवी कंपोनेंट्स, ऑटो सहायक उद्योग, टेक्सटाइल-गारमेंट, फूड प्रोसेसिंग, प्लास्टिक पैकेजिंग, डिफेंस-एयरोस्पेस और ईएसडीएम जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है, जबकि औद्योगिक विकास प्राधिकरण आवश्यकता अनुसार क्षेत्र-विशिष्ट सुविधाएं भी प्रदान करेंगे। इसके तहत भूमि का स्वामित्व प्राधिकरण के पास रहेगा और निजी डेवलपर (कन्सेशनायर) 45 वर्ष (अधिकतम 15 वर्ष विस्तार योग्य) के लिए डिजाइन, वित्तपोषण, निर्माण, संचालन और अनुरक्षण करेगा तथा उद्योगों को सब-लीज पर शेड्स उपलब्ध कराएगा। न्यूनतम 10 एकड़ भूमि (पायलट हेतु 15-20 एकड़ वरीयता) निर्धारित की गई है और न्यूनतम विकास दायित्व (MDO) तय कर भूमि के अनावश्यक संचयन को रोका जाएगा। योजना पूरी तरह वित्तीय अनुशासन पर आधारित है, जिसमें कोई बजटीय सहायता, वीजीएफ या सरकारी गारंटी नहीं होगी, जबकि प्राधिकरण को प्रीमियम, वार्षिक शुल्क और रेवेन्यू शेयर के माध्यम से आय प्राप्त होगी तथा परियोजना अवधि पूर्ण होने पर सभी परिसंपत्तियां उपयोग योग्य स्थिति में वापस प्राधिकरण को हस्तांतरित कर दी जाएंगी।
गोरखपुर बनेगा सोलर सिटी, चिलुआताल में 20 मेगावाट फ्लोटिंग सोलर प्लांट को मिली मंजूरी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में गोरखपुर को सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की दिशा में बड़ा फैसला लिया गया है। इसके तहत चिलुआताल में 20 मेगावाट क्षमता का फ्लोटिंग सोलर पावर प्लांट स्थापित किया जाएगा, जिससे हरित ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के मानकों के अनुसार सोलर सिटी के रूप में विकसित शहरों में 5 वर्षों के भीतर पारंपरिक ऊर्जा की कुल मांग में कम से कम 10% की कमी लाना अनिवार्य है। गोरखपुर के लिए यह लक्ष्य लगभग 121.8 मिलियन यूनिट ऊर्जा अक्षय स्रोतों से प्राप्त करना निर्धारित किया गया है।
चिलुआताल में 80 एकड़ जल क्षेत्र पर बनेगा प्लांट
गोरखपुर के तहसील सदर स्थित चिलुआताल में प्रस्तावित फ्लोटिंग सोलर प्लांट के लिए करीब 80 एकड़ जल क्षेत्र का उपयोग किया जाएगा। यह क्षेत्र पर्यटन विभाग, राजस्व विभाग तथा हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड के स्वामित्व के अधीन है। परियोजना के लिए पर्यटन विभाग की 11.4181 हेक्टेयर (28.20 एकड़) भूमि कोल इंडिया लिमिटेड को निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी। कंपनी इस 20 मेगावाट क्षमता के फ्लोटिंग सोलर प्लांट की स्थापना अपने संसाधनों से करेगी। चिन्हित भूमि ताल श्रेणी की है और धारा-77(1) के अंतर्गत सुरक्षित श्रेणी में आती है। इस पर फ्लोटिंग सोलर प्लांट लगाने से भूमि की मूल प्रकृति में कोई परिवर्तन नहीं होगा, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बना रहेगा।
हर साल 33.29 मिलियन यूनिट हरित ऊर्जा उत्पादन
इस परियोजना से प्रति वर्ष न्यूनतम 33.29 मिलियन यूनिट हरित ऊर्जा का उत्पादन होगा, जिसे विद्युत ग्रिड में जोड़ा जाएगा। इससे गोरखपुर की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी और पारंपरिक ऊर्जा पर निर्भरता घटेगी। फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, निवेश को बढ़ावा मिलेगा और पर्यावरण संरक्षण को मजबूती मिलेगी। साथ ही शहर को स्वच्छ और सतत ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ाने में यह परियोजना महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
औरैया और खुर्जा में संचालित हो रहा फ्लोटिंग सोलर प्लांट
ऊर्जा मंत्री ए के शर्मा ने बताया कि प्रदेश में पहले से ही औरैया में 20 मेगावाट तथा खुर्जा में 11 मेगावाट क्षमता के फ्लोटिंग सोलर प्लांट स्थापित किए जा चुके हैं। गोरखपुर में प्रस्तावित यह प्लांट कोल इंडिया लिमिटेड द्वारा अपने संसाधनों से स्थापित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह परियोजना जल सतह पर आधारित होगी और इसके लिए लगभग 80 एकड़ भूमि उपलब्ध कराई गई है। इस पहल से न केवल हरित ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि होगी, बल्कि गोरखपुर को सोलर सिटी बनाने में भी बड़ी मदद मिलेगी तथा प्रदेश में स्वच्छ ऊर्जा, निवेश और रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।
पछवारा साउथ कोल ब्लॉक विकास को मंजूरी, ₹2242.90 करोड़ की परियोजना से सस्ती बिजली का रास्ता साफ
कैबिनेट बैठक में नेयवेली उत्तर प्रदेश पावर लिमिटेड (एनयूपीपीएल) को आवंटित पछवारा साउथ कोल ब्लॉक के विकास हेतु ₹2242.90 करोड़ की आकलित लागत को मंजूरी प्रदान की गई। यह कंपनी उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड एवं एनएलसी इंडिया लिमिटेड का संयुक्त उपक्रम है। परियोजना का वित्तपोषण 70% ऋण (₹1570.03 करोड़) एवं 30% अंशपूंजी के माध्यम से किया जाएगा, जिसमें उत्पादन निगम की 49% हिस्सेदारी के अनुसार ₹329.71 करोड़ अंशपूंजी देय होगी। इस कोल ब्लॉक से प्राप्त कोयला मुख्य रूप से कानपुर नगर स्थित 3×660 मेगावाट घाटमपुर तापीय विद्युत परियोजना की इकाइयों में उपयोग किया जाएगा। ब्लॉक में खनन कार्य 19 दिसंबर 2025 से प्रारंभ हो चुका है और अगस्त 2026 से कोयला निकासी का लक्ष्य रखा गया है। ऊर्जा मंत्री एके शर्मा ने कहा कि इस कोल ब्लॉक के विकसित होने से घाटमपुर प्लांट में बिजली उत्पादन लागत में उल्लेखनीय कमी आएगी। प्रारंभिक आकलन के अनुसार लगभग 80 पैसे प्रति यूनिट तक बिजली सस्ती होगी, जबकि कुल मिलाकर करीब ₹1 प्रति यूनिट तक कमी आने की संभावना है। इससे प्रदेश को सस्ती, सुलभ और निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने में बड़ी मदद मिलेगी।
इंटरनेशनल एक्जीबिशन-सह-कन्वेंशन सेंटर के लिए पुनरीक्षित लागत को कैबिनेट स्वीकृति, लखनऊ में बनेगा अंतरराष्ट्रीय स्तर का आयोजन स्थल
लोकभवन में सोमवार को आयोजित कैबिनेट बैठक में प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बुनियादी ढांचे, हेरिटेज संरक्षण और यातायात व्यवस्था को सशक्त बनाने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं को मंजूरी प्रदान की गई है। इन परियोजनाओं में लखनऊ के वृन्दावन योजना सेक्टर-15 में प्रस्तावित इंटरनेशनल एक्जीबिशन-सह-कन्वेंशन सेंटर के निर्माण के लिए पुनरीक्षित लागत को स्वीकृति प्रदान की गई है। साथ ही कैबिनेट फैसलों में राजधानी के ऐतिहासिक घरोहर के संरक्षण के उद्देश्य से रोशन-उद-दौला भवन और छतर मंजिल को ‘एडाप्टिव रि-यूज’ के तहत पीपीपी मॉडल पर विकसित करने और परिवहन सुविधा के लिए दुबग्गा चौराहे पर फ्लाईओवर निर्माण करने की परियोजना की स्वीकृति शामिल हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में आयोजित कैबिनेट बैठक में राजधानी लखनऊ में नागरिक सुविधाओं के विकास के लिए इंटरनेशनल एक्जीबिशन-सह-कन्वेंशन सेंटर की पुनरीक्षित लागत को स्वीकृति प्रदान की गई है। कैबिनेट ने लखनऊ की वृन्दावन योजना, सेक्टर-15 में प्रस्तावित इंटरनेशनल एक्जीबिशन-सह-कन्वेंशन सेंटर के निर्माण के लिए पहले 1297.42 करोड़ रुपये की लागत को स्वीकृत किया था, लेकिन निविदा प्रक्रिया के दौरान लागत अधिक आने के कारण इसे संशोधित कर 1435.25 करोड़ रुपये को मंजूर दी गई है। इस लागत में जीएसटी, लेवी, कंटीजेंसी और सुपरविजन चार्ज सहित अन्य खर्च भी शामिल हैं। ईपीसी मोड पर बनने वाले इस अत्याधुनिक कन्वेंशन सेंटर में 10,000 लोगों की क्षमता वाला विशाल कन्वेंशन हॉल और 2,500 लोगों की क्षमता का ऑडिटोरियम बनाया जाएगा। साथ ही बड़े स्तर पर पार्किंग की सुविधा और सुरक्षा मानकों के अनुरूप भीड़ नियंत्रण व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।
इंटरनेशनल एक्जीबिशन-सह-कन्वेंशन सेंटर का निर्माण प्रदेश की राजधानी, लखनऊ में अंतरराष्ट्रीय स्तर के डिफेंस एक्सपों जैसे आयोजनों के स्थल के रूप में की जा रही है। कन्वेंशन सेंटर के आसपास 5-स्टार और बजट होटल विकसित करने की भी योजना है, जिससे देश-विदेश से आने वाले आगंतुकों को बेहतर आवास सुविधाएं मिल सकें। साथ ही, यहां आयोजित होने वाले आयोजनों के दौरान भारी उपकरणों, मॉडलों के प्रदर्शन की भी व्यवस्था होगी। यह परियोजना लखनऊ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख आयोजन स्थल के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
इसी क्रम में योगी सरकार की ने लखनऊ की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और उपयोग को बढ़ावा देने के लिए भी महत्वपूर्ण कदम उठाया है। रोशन-उद-दौला भवन और छतर मंजिल को ‘एडाप्टिव रि-यूज’ के तहत सार्वजनिक-निजी सहभागिता (पीपीपी) मॉडल पर विकसित करने को कैबिनेट ने मंजूर प्रदान की है। इसके लिए इन भवनों से संबंधित भूमि का स्वामित्व पर्यटन विभाग को निःशुल्क हस्तांतरित करने का प्रस्ताव किया गया है। इन ऐतिहासिक इमारतों को हेरिटेज पर्यटन इकाइयों के रूप में विकसित कर राज्य में पर्यटन को नई दिशा देने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह भूमि हस्तांतरण अपवादस्वरूप किया जा रहा है और इसे भविष्य के लिए उदाहरण नहीं माना जाएगा।
साथ ही लखनऊ की यातायात समस्या के समाधान के लिए भी एक महत्वपूर्ण परियोजना को मंजूरी दी गई है। इस क्रम में लखनऊ-हरदोई मार्ग पर स्थित दुबग्गा चौराहे पर 1,811.72 मीटर लंबा तीन लेन का फ्लाईओवर बनाया जाएगा। इस परियोजना की कुल लागत 305.31 करोड़ रुपये निर्धारित की गई है, जिसे कैबिनेट द्वारा अनुमोदन प्राप्त हो चुका है। दुबग्गा चौराहा लखनऊ शहर का एक प्रमुख यातायात केंद्र है, फ्लाईओवर के निर्माण से इस क्षेत्र में ट्रैफिक जाम की समस्या से काफी हद तक राहत मिलने की उम्मीद है। सरकार का मानना है कि ये सभी परियोजनाएं लखनऊ को आधुनिक, सुव्यवस्थित और पर्यटन के दृष्टिकोण से आकर्षक शहर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
योगी कैबिनेट ने सेफ रि-यूज ट्रीटेड वाटर पॉलिसी को दी मंजूरी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में प्रदेश सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए शोधित जल (ट्रीटेड वॉटर) के सुरक्षित पुनः उपयोग के लिए नई नीति लागू करने की तैयारी कर ली है। इस नीति का उद्देश्य घरों और उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट जल को शोधित कर दोबारा उपयोग में लाना है, जिससे पेयजल संसाधनों पर दबाव कम हो सके।
प्रदेश में सिंचाई, घरेलू, औद्योगिक और ऊर्जा क्षेत्रों में पानी की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में सरकार ने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) और फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट (एफएसटीपी) के जरिए शोधित जल के सुरक्षित उपयोग को बढ़ावा देने की योजना बनाई है।
नीति के तहत शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में निकलने वाले अपशिष्ट जल को ट्रीट कर पहले चरण में नगर निकाय उपयोग, निर्माण कार्य, बागवानी और सिंचाई में इस्तेमाल किया जाएगा। दूसरे चरण में उद्योग, कृषि और रेलवे जैसे क्षेत्रों में इसका विस्तार होगा। वहीं तीसरे चरण में ड्यूल पाइप सिस्टम के जरिए घरों तक गैर-पीने योग्य उपयोग के लिए पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।
योगी सरकार का लक्ष्य है कि तकनीक और नवाचार के माध्यम से जल प्रबंधन को मजबूत बनाया जाए। इस पहल से जहां एक ओर स्वच्छ पेयजल की बचत होगी, वहीं दूसरी ओर जल निकायों में प्रदूषण भी कम होगा। इससे जल संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और ऊर्जा खपत में भी कमी आएगी।
कैबिनेट ने धारा-80 संशोधन अध्यादेश 2026 को दी मंजूरी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में उ0प्र0 राजस्व संहिता, 2006 की धारा-80 में संशोधन हेतु अध्यादेश 2026 को मंजूरी दे दी गई। इस अहम फैसले के तहत विकास प्राधिकरणों, औद्योगिक विकास प्राधिकरणों, विनियमित क्षेत्रों तथा उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद के अधीन क्षेत्रों में गैर-कृषि उपयोग (लैंड यूज़) परिवर्तन की प्रक्रिया को बेहद सरल बना दिया गया है।
अब इन क्षेत्रों में अलग से लैंड यूज बदलवाने की आवश्यकता नहीं होगी। यदि किसी भूखंड का नक्शा प्राधिकरण द्वारा पास हो जाता है, तो उसी को भूमि उपयोग परिवर्तन माना जाएगा। इससे पहले लोगों को दोहरी प्रक्रिया (पहले लैंड यूज परिवर्तन और फिर नक्शा पास कराने) से गुजरना पड़ता था, जिससे समय और संसाधनों की अधिक खपत होती थी।
वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने बताया कि नई व्यवस्था में नक्शा पास कराने की प्रक्रिया में ही सभी औपचारिकताएं समाहित कर दी गई हैं। इससे न केवल आमजन को बड़ी राहत मिलेगी, बल्कि निवेशकों के लिए भी प्रक्रिया आसान और पारदर्शी बनेगी। इस सुधार से प्रदेश में निवेश को बढ़ावा मिलेगा, उद्योग स्थापना में तेजी आएगी और उत्तर प्रदेश के औद्योगिक विकास को नई दिशा मिलेगी।