अक्षय तृतीया पर दिव्य 'चंदन श्रृंगार' की तैयारी, 500 वर्षों से जारी है राधा दामोदर मंदिर की यह अनूठी परंपरा
Gargachary Times
14 April 2026, 20:16
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Dharam
पुनीत शुक्ला:
वृंदावन। चैत्र की विदाई और वैशाख के आगमन के साथ ही ब्रजमंडल में गर्मी का असर तेज होने लगा है। ऐसे में अपने आराध्य को शीतलता प्रदान करने के लिए वृंदावन के मंदिरों में विशेष सेवा का क्रम शुरू हो गया है। श्रीधाम वृंदावन के प्रतिष्ठित 'सप्त देवालयों' में प्रमुख ठाकुर राधा दामोदर मंदिर में अक्षय तृतीया के पावन पर्व को लेकर तैयारियां इन दिनों चरमोत्कर्ष पर हैं। इस वर्ष भी परंपरा के अनुरूप, भगवान श्री कृष्ण को भीषण गर्मी से राहत दिलाने के लिए दक्षिण भारत से आए विशेष चंदन का लेप लगाया जाएगा।
अक्षय तृतीया के दिन होने वाले इस विशेष श्रृंगार की तैयारी कोई साधारण प्रक्रिया नहीं है। मंदिर के सेवायतों द्वारा इसकी शुरुआत होली के तुरंत बाद ही कर दी गई थी। मंदिर के सेवायत आचार्य पूर्ण चंद्र गोस्वामी महाराज ने बताया कि इस उत्सव के लिए दक्षिण भारत (साउथ) से उच्च कोटि का मलयागिरी चंदन मंगवाया गया है। नित्य प्रतिदिन मंदिर के सेवायत और अनुयायी मिलकर इस चंदन को सिल-बट्टों पर घिसते हैं। इस लेप को और अधिक प्रभावशाली और सुगंधित बनाने के लिए इसमें कई प्रकार की दुर्लभ जड़ी-बूटियां, केसर और गुलाब जल का मिश्रण किया जाता है। कई हफ्तों की इस कड़ी मेहनत के बाद वह पर्याप्त लेप तैयार होता है, जिससे ठाकुर जी का संपूर्ण अभिषेक और श्रृंगार संभव हो पाता है।
इस सेवा के पीछे छिपे आध्यात्मिक इतिहास पर प्रकाश डालते हुए आचार्य कृष्ण बलराम गोस्वामी महाराज ने बताया कि यह परंपरा लगभग 500 वर्ष पुरानी है। इसके मूल में गौड़ीय संप्रदाय के महान संत माधवेंद्र पुरी पाद महाराज की भक्ति जुड़ी है।
500 वर्ष पूर्व जब माधवेंद्र पुरी महाराज गोवर्धन के जतीपुरा में श्रीनाथजी की सेवा करते थे, तब ठाकुर जी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए थे। भगवान ने उनसे कहा था कि छप्पन भोग के सेवन से उनके पेट की गर्मी तो शांत हो जाती है, परंतु ग्रीष्म ऋतु में शरीर का ताप कम करने के लिए उन्हें मलयागिरी चंदन की आवश्यकता है। प्रभु की आज्ञा पाकर महाराज पैदल ही दक्षिण की ओर चल पड़े थे। रास्ते में ओडिशा के रेमुना में स्थित खीरचौरा गोपीनाथ ने भी उन्हें दर्शन देकर चंदन सेवा का आदेश दिया। माना जाता है कि तभी से पुरी में 21 दिवसीय चंदन यात्रा और ब्रज के मंदिरों में अक्षय तृतीया पर चंदन लेपन की यह विशिष्ट रीत शुरू हुई।
अक्षय तृतीया के दिन का मुख्य आकर्षण ठाकुर जी के 'सर्वांग दर्शन' होते हैं। सेवायत करुण गोस्वामी ने बताया कि वर्ष के अन्य दिनों में ठाकुर जी को कीमती वस्त्र और आभूषण धारण कराए जाते हैं, लेकिन अक्षय तृतीया के दिन प्रभु कोई भी वस्त्र धारण नहीं करते। उनके संपूर्ण श्रीविग्रह (मस्तक से लेकर चरणों तक) पर चंदन का गाढ़ा लेप लगाया जाता है। चंदन से ही उनके वस्त्र, आभूषण और कलात्मक आकृतियां उकेरी जाती हैं। भक्त इस दिन अपने आराध्य का वह स्वरूप देख पाते हैं जो साल में अन्य किसी दिन सुलभ नहीं होता।
मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर ठाकुर राधा दामोदर के इस शीतल स्वरूप के दर्शन करने से भक्तों के मानसिक और शारीरिक ताप का शमन होता है और उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस अलौकिक दृश्य के साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु वृंदावन कूच करते हैं। उत्सव की समाप्ति के बाद, ठाकुर जी के अंगों से उतारे गए इस पवित्र चंदन को एकत्रित किया जाता है और 'प्रसादी' के रूप में भक्तों में वितरित किया जाता है। श्रद्धालु इस चंदन को अपने मस्तक पर धारण करते हैं और इसे सौभाग्य का प्रतीक मानते हैं।