फिर सुर्खियों में आया डालमिया फार्म हाउस की विवादित जमीन का मामला
Gargachary Times
9 May 2026, 21:16
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Mathura
वृंदावन। छटीकरा-वृंदावन मार्ग पर स्थित बहुचर्चित डालमिया फार्म हाउस का प्रकरण एक बार फिर गर्मा गया है। मामला देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) और एनजीटी में लंबित होने के बावजूद, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण द्वारा इस विवादित भूमि पर नक्शा पास करने के लिए आपत्तियां मांगे जाने से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है। प्राधिकरण की इस कार्यप्रणाली ने अदालती आदेशों की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ज्ञात हो कि 18 सितंबर 2024 की रात डालमिया फार्म हाउस में खड़े 454 हरे पेड़ों को बेरहमी से काट दिया गया था। इस पर्यावरण क्रूरता ने शासन-प्रशासन में खलबली मचा दी थी। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए नवंबर 2024 में उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों और डालमिया फार्म हाउस पक्ष को अवमानना का नोटिस जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि इस भूमि पर 'यथास्थिति' बरकरार रखी जाए और किसी भी प्रकार के निर्माण पर रोक लगा दी गई थी।
हाल ही में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण द्वारा जारी एक सार्वजनिक सूचना में कहा गया है कि मैसर्स बद्रीनाथ कंस्ट्रक्शन के प्रोप्राइटर ने पूर्व में स्वीकृत ऑनलाइन मानचित्र में संशोधन करते हुए होटल बिल्डिंग की स्वीकृति हेतु आवेदन किया है। मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण ने इस पर 15 दिनों के भीतर आपत्तियां और सुझाव मांगे हैं। हैरानी की बात यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने निर्माण पर रोक लगा रखी है और अभी तक इस जमीन के लिए कोई अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी नहीं हुआ है, तो विकास प्राधिकरण ने फाइल को आगे कैसे बढ़ाया
चर्चा है कि इस बेशकीमती जमीन में शहर के बड़े रसूखदारों, उद्योगपतियों और रसूखदार जनप्रतिनिधियों का मोटा पैसा लगा हुआ है। इस विवादित मामले को रफा-दफा करने के लिए कथित तौर पर प्रशासनिक मशीनरी पर दबाव बनाया जा रहा है। वहीं, दूसरी ओर उन छोटे निवेशकों की नींद उड़ी हुई है जिन्होंने लाखों रुपये की बुकिंग कराई थी। अब वे कानूनी दांवपेच में फंसकर अपनी जमा पूंजी डूबने के डर से सहमे हुए हैं।
इस संबंध में जब मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के सचिव से संपर्क किया गया, तो उन्होंने कहा कि विभाग द्वारा नियमानुसार 15 दिन के अंदर आपत्तियां मांगी गई हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी में विचाराधीन है, इसलिए फिलहाल वहां कुछ नहीं होगा और पूरे मामले की बारीकी से जांच कराई जाएगी।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी कर निर्माण की तैयारी और प्राधिकरण की भूमिका ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। अब देखना यह होगा कि कोर्ट के सख्त निर्देशों के बीच यह 'विवादित जमीन का जिन्न' आगे क्या मोड़ लेता है।