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वायु पर जीवन यापन करने वाले संत अवधूत दादा गुरु का कल होगा आगमन, तीन दिन तक रहेंगे ब्रज में

Gargachary Times 8 June 2026, 21:32 51 views
Mathura
वायु पर जीवन यापन करने वाले संत अवधूत दादा गुरु का कल होगा आगमन, तीन दिन तक रहेंगे ब्रज में
वृंदावन। चार संप्रदाय आश्रम में आयोजित अष्टोत्तरशत श्रीमद्भागवत कथा एवं विशेष अनुष्ठान के अंतर्गत मंगलवार को वायु पर जीवन यापन करने वाले तपस्वी संत अवधूत दादा गुरु का आगमन होगा। दादा गुरु कल मंगलवार 9 से 11 जून तक ब्रज में प्रवास कर धार्मिक अनुष्ठानों, परिक्रमा और आध्यात्मिक कार्यक्रमों में सहभागिता करेंगे। यह जानकारी देते हुए व्यासपीठासीन साध्वी सत्यप्रिया ने बताया कि अवधूत दादा गुरु पिछले छह वर्षों से केवल वायु ग्रहण करते हुए तप साधना में लीन हैं। ऐसे तपस्वी संत का ब्रज आगमन संपूर्ण ब्रजवासियों के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने कहा कि जिन महापुरुषों के बारे में अब तक केवल सुना जाता था, ऐसे संत का सान्निध्य मिलना सौभाग्य की बात है। उन्होंने बताया कि आश्रम में चल रहा विशेष अनुष्ठान दादा गुरु के संकल्प से ही संचालित हो रहा है। उनका प्रमुख संकल्प काशी के नंदी का भगवान भोलेनाथ से मिलन कराना है। उन्होंने कहा कि अधिक मास में मां यमुना की गोद में प्रारंभ हुआ यह संकल्प अब एक बड़े आध्यात्मिक अभियान का रूप ले चुका है। साध्वी का कहना है कि अगले तीन वर्षों के भीतर लोग नंदी का भगवान से मिलन होते हुए देखेंगे। साध्वी सत्यप्रिया ने बताया कि दादा गुरु 10 जून को शाम पांच बजे वृंदावन धाम की परिक्रमा करेंगे, जबकि 11 जून को गोवर्धन परिक्रमा में शामिल होंगे। उनके आगमन को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति पर समय-समय पर उठने वाले प्रश्नों के बीच संत समाज ही लोगों का मार्गदर्शन करता है। दादा गुरु का जीवन और साधना सनातन की जड़ों को मजबूत करने का कार्य कर रही है। उनके सान्निध्य से लोगों में धर्म, संस्कृति और प्रकृति के प्रति नई चेतना का संचार हो रहा है। साध्वी सत्यप्रिया ने दावा किया कि दादा गुरु की साधना और जीवन पद्धति को लेकर विभिन्न स्तरों पर रुचि बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि यह विषय वर्तमान में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संज्ञान में है तथा भविष्य में इस संबंध में वैज्ञानिक अध्ययन और प्रशिक्षण की दिशा में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की भी भूमिका सामने आ सकती है। यदि वैज्ञानिक संस्थान इसकी पुष्टि करते हैं तो दुनिया को इसकी सत्यता स्वीकार करनी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि दादा गुरु लगातार प्रकृति संरक्षण का संदेश दे रहे हैं। उनका मानना है कि मनुष्य प्रकृति के साथ लगातार खिलवाड़ कर रहा है। लोग पौधारोपण तो करते हैं, लेकिन उसके संरक्षण की जिम्मेदारी नहीं निभाते। जबकि वृक्ष ही प्रत्यक्ष देव स्वरूप हैं। भारतीय संस्कृति में वट, पीपल और अन्य वृक्षों की पूजा का आधार भी यही है। उन्होंने कहा कि दादा गुरु का स्पष्ट संदेश है कि नंदी नहीं तो सदी नहीं, नदियों और वृक्षों के बिना मानव सभ्यता का भविष्य सुरक्षित नहीं रह सकता। इसलिए प्रकृति संरक्षण को केवल अभियान नहीं, बल्कि जन-आंदोलन बनाना होगा। श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में भी वृक्षों और प्रकृति के महत्व का उल्लेख मिलता है, जो भारतीय संस्कृति की पर्यावरणीय चेतना का प्रमाण है।
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