Loading...

विजय साधना एवंशक्ति का प्रतीक है बिजया दशमी का पर्व

Gargachary Times 18 October 2026, 19:39 71 views
Dholpur
विजय साधना एवंशक्ति का प्रतीक है बिजया दशमी का पर्व
डा० हरिप्रकाश लवानियाँ धौलपुर भारतीय परंपरा मेंमनाए जाने वाले पर्व केवल उत्सव मात्र नहीं होतेबल्किहर पर्व के पीछेकोई गहरा संदेश छुपा होता हैजो समाज कोनई दिशा देता हैनवरात्रि की साधना के बादआने वाला यह दिनशक्ति के जागरण एवं उसकेसार्थक उपयोग का प्रतीक हैविजयदशमीशक्ति की उपासना का दिन आश्विन शुक्लदशमी को मनाया जाने वाला बिजया दशमी का पर्वभारतीय जीवन मेंविशेष कर हिंदू जनमानस मेंविशेष महत्व रखता हैमुख्य रूप से यह पर्वबुराई पर अच्छाईअसत्य पर सत्य एवं अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है धार्मिक मान्यताओं के अनुसारभगवान श्री राम ने लंका के अहंकारी और अत्याचारी राजा रावण का वध करके माता-पिता को उसके चंगुल से मुक्त कराया थारावण प्रकांड विद्वान था लेकिन उसके अहंकार धर्म ने उसका पतन कर दियादूसरा इसी दिन आदि शक्ति मां दुर्गा ने नौ दिनों के युद्ध के बाद महिषासुर नमक भयंकर राक्षस का बध कर देवताओं एवं त्रिलोक को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी इसीलिए उसे बिजय की दशमी कहा जाता हैमहाभारत में इस दिन पाण्डवों द्वारा शमी वृक्ष से अपने अश्वशास्त्र निकालकर सेना को परास्त करने का प्रसंग भी जुड़ा है इसके कारण इस दिन शस्त्र पूजा की अनू ठीपरंपरा हैविजयादशमी से पहलेदेश भर में9 दिनों तक शारदीय नवरात्रि पर भव्य रामलीलाओं का आयोजन होता है इसमें प्रभु राम के जीवन चरित्र का मंचन किया जाता है देश के विभिन्न भागों मेंविभिन्न तरीकों सेविजयदशमी का पर्वमनाने की परंपरा है दसवीं की शाम कोविशाल मैदान में रावण उसके भाई को मकानऔर पुत्र मेघनाथ केऊंचे पतले खड़े किए जाते हैं और उनके बीच उनका अध्ययन किया जाता हैयह दृश्य अहंकार केसमूह नशा को दर्शाता है।पूर्वी भारत मेंविशेष कर बंगाल में इस दिन कोदुर्गा पूजा के अंतिम दिन के रूप में मनाया जाता है अत्यंत भावुक क्षणों के बीच उत्सव मनाते हुए मां दुर्गा की प्रतिमा का पवित्र सरोवरों में विसर्जन किया जाता है_दशहरे को एक अबूझ औरत अत्यंत शुभ मुहूर्त माना जाता है लोग इस दिन नए वाहन आभूषण भूमि या मकान की खरीदारी करते हैंऔर नए व्यापार व कार्यों का शुभारंभ करते हैं प्राचीन काल मेंराजा लोगइस दिन विजय की प्रार्थनाकर करयुद्ध भूमि मेंप्रवेश करते थेऐसा माना जाता हैइस दिन पूजा अर्चना के बादकिए गए किसी भी कार्य मेंअवश्य विजय मिलती हैब्रज उत्तर प्रदेश एवंबुंदेलखंडमेंदशहरे के दिनबच्चे मिट्टी से बनाए गएतीन टांगों पर खड़े देसूजो के लड़के का प्रतीक हैऔर छेड़ने वाली मटकी से बनीझांझीजो एक लड़की का प्रतीक हैको सजा कर अपने घर लाते हैंपुराना पुराना मान्यताओं के अनुसार टेसूमहाभारत काल के महान योद्धाभीम के पौत्र बर्बरीक हैंजिन्हें आज खाटू श्याम जी के नाम से भी जाना जाता हैबर्बरीक के पास इतनी शक्तियां थी तो अकेले ही महाभारत को समाप्त कर सकता थायुद्ध का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान कृष्ण नेदान में उसका सिर मांग लिया था .श्री सदन करने के बाद बर्बरीक ने भगवान कृष्ण से महाभारत के युद्ध को देखने की इच्छा जताई तो भगवान श्री कृष्ण नेउसके सिर रख दियाकोएक ऊंचे स्थान परतीन सरकंडों के सहारे रख दियायुद्ध के बादबर्बरीक का विवाह ज्ञानी नाम की कन्याश बनाते हुआ था प्रेम कहानी के लिए भगवान कृष्ण वरदान दिया कि हर साल मनाया जाएगातभी से यह परंपरा अनवरत आज भी कायम हैइस परंपरा के बादशरद पूर्णिमा के दिन पेशावर जानकी का धूमधाम से विवाह कराया जाता हैविवाह संपन्न होने के बाद शरद पूर्णिमा की रात को ही या उसके अगले दिन दोनों का आदरपूर्वक नदी तालाब के पूरे विसर्जन कर दिया जाता हैसनातन परंपरा के अनुसारछात्र में उसके दौरान मंगल कार्य होते हैं ग्रामीण संस्कृति में मान्यता है कि विवाह के बाद भी समझ में शादियों के लगन और शुभ कार्यों की शुरुआत होती है आ ज आवश्यकता इस बात की है किरावण के पुतले का दहन नहीं बाल्कि हमारे अंदर बैठे रावण केपुतले का समू ल नाश हो ना चाहिएतभी भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता अक्षुण रह पाएगी
Follow Samachar24